Sunday, February 10, 2008

" क्यूं "

किया मैंने इश्क जिससे,
माना मैंने अपना जिसको,
देखा ख्वाबो में हरपल जिसको,
किया न्योछावर सबकुछ जिसपर,
क्यूँ छोड़ गया ऐसे मुझको?
थी कमी कुछ मुझेमे शायद!
या थी उसकी बातें छलावा.
सोचती हूँ
शायद ........
दे ना सकी मैं
वो सब,
ज़िनकी थी उसको
अनकही चाहत.

4 comments:

Unknown said...

nice poem..

डाॅ रामजी गिरि said...

"थी कमी कुछ मुझेमे शायद!
या थी उसकी बातें छलावा.
सोचती हूँ
शायद ........"

प्रेम-विरह वेदना पर मार्मिक रचना ....

प्यार एक अनवरत स्तिथि है दिल की,
थोड़े समय के लिए संसार मिथ्या लगता है...
पर PHOENIX की तरह प्रेम अमर है.....

Neelima G said...
This comment has been removed by the author.
Naveen said...

apne jaane kya soch k mujhe post kiya,pata nahin.par lkab kar hi diya to apne vichaar vyakt kar ra hoon..."kyun" k hawa mein tairte huye kayi aawara zawaab ho sakte hain jisse kavita ka matlab hi kuchh pakka nahi nikal pata.
Confusing hai par sidhe shabdon k tour pe achchhi hai.
Mera pata kaise paya,janne ko utsuk hoon,batayengi plz.