Monday, June 9, 2008

वो मीरा थी...

People say lots of things about Meera Bai, but in reality she was the one who loved Krishna without any expectation and wordly inclinations. Here i have written a poem to show the feelings of meera bai in this poem.


इन्तज़ार बहुत था
उनके आने का ,
पर उम्मीद नहीं.

लेकिन
जिसने नहीं छोडा साथ
कान्हा का,
जिसने हर पल किया
उसको याद ,
वो मीरा थी...

वादे तो सब करते है
साथ जीने- मरने के ,
बिरले होते है जो
नहीं करते बात
साथ रहने की.

लेकिन
दूर होते हुए भी
जिसने
कान्हा से निभाया
वो मीरा थी...

मैं कब कहती हूँ
मिलता है सबको
सब कुछ यहाँ,
जिसने माना
एक कान्हा को
हक़ से अपना,
जो प्यार को
पूजा कहती थी
वो एक मीरा थी...

Saturday, May 31, 2008

इश्क...

इश्क कहाँ कम है इबादत से दोस्तों,
इश्क तो जुड़ा है हर मज़हब से दोस्तों,
जिसने पैदा किया हीर - रांझे को,
जिसने रची है यह कायनात,
जिसने बनाया है मुझको, तुमको,
जिसने बनाया है इश्क को, नफ़रत को,
उसी अल्लाह की इबादत है इश्क दोस्तों...

Monday, April 21, 2008

एक एहसास

एक एहसास जो दिल में है,
एक ख्वाहिश ना जाने कब से है?
एक अरमान पूरा हुआ-सा लगता है,
फिर ये अभिलाषा क्यूँ हरपल है?
उम्मीद का दामन छुटता ही नहीं
आशाओ का दीपक बुझता ही नहीं ,
यह अजनबी नशा नया नवेला ,
जिसमे कोई बहकता ही नहीं ,
होश का दामन थामे बेहोश इंसान रहता है,
और दुनियावालों को मदहोश-सा लगता है,
हाल यह तब होता है,
इश्क जब परवान चढ़ता है.

इस मर्ज की न कोई दवा है,
बेकार इसपर सारी दुआ है,
एक ही उपाय काम करता है,
उसका अक्स दिल मे बसता है,
हाल होता है ऐसा सबका,
इश्क जब परवान चढ़ता है...

Tuesday, March 4, 2008

बेटियाँ...

बेटियाँ को क्यूँ ऐसा बनाया विधाता तूने,
जहाँ जाती है दुनिया रंगीन बनाती है,
बचपन मे बाबुल के आँगन की रौनक,
जवानी मे साजन के घर की इबारत,
और बुढ़ापे मे बच्चों के जीवन का आधार.
इतना सहनशील क्यूँ बनाया बेटियाँ को विधाता तूने,
सहती है सारी बंदिशे- परिवार की रंजिशे;
उमीद की जाती है सारा बोझ उठाने की,
फुर्सत नही दी जाती है उन्हे उफ़ तक करने की,
इस पर भी मॅन नही भरा विधाता तेरा,
जो बनाया बेटियाँ को बेटियो का दुश्मन तूने???

Friday, February 15, 2008

मेरा चाँद...

रात भर अपने चाँद
की पहरेदारी करती रही,
रात भर अपने चाँद को ,
चान्दनियों मे खोजती रही.
इस उमीद मे बैठी रही की,
सुबह होते ही,
छूट ना जाए तेरा साथ.
बस अगर चलता मेरा ,
रोक देती सारी कायानत,
और बनी रह जाती,
सारी उमर तेरे साथ.

वक़्त था भागा जा रहा उस रात,
हवा के झोंके सा सुखद एहसास ,
उमीद का दामन छूटा जा रहा था .
बस अगर चलता मेरा,
उस पल मे जी लेती ज़िंदगी सारी,
और चल देती संग तेरे साँसे मेरी...

Tuesday, February 12, 2008

'इवा'

सुंदर काया, चंचल आभा,
भोली सूरत, नटखट मन ,
तुम हो एक ऐसी चिड़िया,
बोली जिसकी शहद-सी मीठी,
प्रतिबिंब अपने पिता का,
पुलिंदा माँ के सपनो का,
सबकी उम्मीदों का सुनहरा अंबर,
तुम हो 'इवा' एक अदभुत किरण.

सपने हज़ार आँखों मे,
समाये रहते दिन रात,
जीतने की चाहत,
शिखर पे हर क्षेत्र मे,
बड़े है ख्वाब तुम्हारे,
और उफनता जुनून दिल मे,
जाना है यह मैने
तुम हो एक अदभुत किरण,
जिसको चोकलेट–आइसक्रीम बहुत है भाती.

खुशिया रहे सदा आँगन तुम्हारे,
अपने सारे रहे सदा संग तुम्हारे,
आरजू यही है मेरी आज तुम्हारे लिए…

Monday, February 11, 2008

अस्तित्व उनका…

इस सर्द सुबह को और हसीन बनाती,
इन ऑस की बूँदों मे,
खोजती रही मैं,
हर हवा के झोंके मे,
उनके अस्तित्व को,
खोजती रही,
हर मोड़ पर,
मैं अपने उनको.

विश्वास की परिभाषा वो है,
प्यार की प्रतिमा जो है,
आईने मे देखा आज,
जब खुद को,
एहसास ये गहराया है,
खोज रही थी जग मे जिसको,
रोम-रोम मे मेरे,
बसा है अस्तित्व उनका…